जनता भले जितनी गाली दे ले, इनसे बड़े रामभक्त नही देखे

Naresh Agarwal joined BJP

व्हिस्की में विष्णु बसे, रम में बसे श्रीराम। जिन में माता जानकी और ठर्रे में हनुमान।।

कल से ये पंक्तियां हर जगह छाई हुई हैं क्योंकि पिछले साल इस महान रचना को दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद में बोलकर, कुख्यात बनाने वाले सांसद नरेश अग्रवाल, मुल्ला मुलायम का साथ छोड़ राम भक्तों की टोली में शामिल हो गए हैं।

बीजेपी के धुर समर्थक जिन्हें बीजेपी के कट्टर विरोधी नफ़रत से “भक्त” बुलाते हैं, बड़े ही असमंजस में हैं क्योंकि जिन नरेश अग्रवाल को उन्होंने हिन्दू धर्म के अपमान पर पानी पानी पी कर कोसा था आज वही उनकी पार्टी के खासमखास हो गए हैं। बहुत से समर्थक बीजेपी को कभी वोट न देने की धमकी दे रहे हैं तो बहुत से NOTA का इस्तेमाल करने की। दूसरी तरफ विरोधी बीजेपी समर्थकों की टांग खींचने का मौका नही छोड़ रहे हैं जो उनकी तिलमिलाहट को और बढ़ा रहे हैं। खैर ये तो राजनीति हैं तो समय बदलता रहता ही हैं पर अभी इस संकट की घड़ी से निपटने के कुछ ट्रिप्स एंड ट्रिक्स हैं जिन्हें इस्तेमाल करके खुद को थोड़ी सांत्वना दी जा सकती हैं:

– भगवान् बुद्ध ने कहा था कि “पाप से घृणा करो पापी से नही”। वैसे पिछले कुछ समय से म्यांमार और अब श्रीलंका में जो देखने को मिल रहा हैं, उससे लगता हैं कि बौद्ध धर्म के लोग भी अब इस विचार को कोई खास भाव नही दे रहे पर दुसरे देश तो बौद्ध धर्म का ससुराल हैं, मायका तो अपना देश ही हैं। ये सोचकर हम भी कह सकते हैं कि बीजेपी भगवान बुद्ध के आदेश का पालन करते हुए नरेश जी के पापों से ही घृणा करती थी, पर उसने नरेश जी से कभी घृणा की नही। अगर किसी को ऐसा लगा हो तो वो उसके मन का वहम भर ही था।
 
– ये तो सर्वविदित हैं कि कमल का फ़ूल एक ऐसा फ़ूल हैं जो कीचड़ में ही खिलता हैं। अब फ़ूल तो कुछ एक जगह को छोड़कर ज्यादातर जगह खिल ही चुका हैं पर खिले हुए फ़ूल को संभालना भी तो हैं जिसके लिए कीचड़ बहुत ज़रूरी हैं। शायद ये वजह भी हो सकती है कि बीजेपी, कांग्रेस के नारायण राणे और समाजवादी दल के नरेश अग्रवाल जैसे नेताओं को पार्टी में इकट्ठा कर रही हैं। वैसे भी मोदी जी तो शुरू से ही कहते रहे हैं, “सबका साथ सबका विकास” तो अब जब वो अपना एक वादा जब पूरा कर रहे हैं तो फिर किसी को दिक्कत क्यों होनी चाहिए ।
 
– और इन दोनों से मन को तसल्ली न हुई हो तो ग़ालिब का ये शेर पढ़ लीजिये। “शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर या वो जगह बता जहाँ पर ख़ुदा नहीं”। हर धर्म विशेषकर हिन्दू धर्म ये कहता हैं कि कण कण में भगवान हैं पर कुछ विरले ही लोग होते हैं जो इसको दिल से मानते हैं और सही मायनों में वही सच्चे भक्त भी होते हैं। इस लिहाज से नरेश अग्रवाल तो सबसे बड़े रामभक्त हैं जिनको शराब की अलग अलग वैरायटी में भी पूरी रामायण दिखती हैं। हालाँकि लोगों ने इसको गलत तरीके से समझ लिया पर बीजेपी उनके असली भावार्थ को अच्छे से समझ गयी थी इसलिए उनका अपनी टोली में फूल मालाओं के साथ स्वागत कर लिया।
 
खैर इन सब फालतू बातों से भी कुछ बेहतर महसूस न हुआ हो तो मुद्दे की बात बस इतनी सी हैं कि कोई नेता और कोई पार्टी बिना फायदे के तो एक दुसरे के गले पड़ते नही। लोकसभा में तो बीजेपी का बोलबाला हैं पर राज्यसभा में पिछले 4 सालों से छीछालेदर हुई पड़ी हैं। बड़े जोशोखरोश के साथ नगाड़े बजाते हुए लोकसभा से कानून पास करके लाते हैं जो राज्यसभा में औंधे मुंह गिर जाता हैं। अब यूपी की तरफ से राज्यसभा की 10 सीटें खाली हो रही हैं। बीजेपी की 8 और समाजवादी की 1 सीट पक्की हैं। बची 1 सीट को मायावती, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के आगे हाथ जोड़कर जीतने की कोशिश कर रही हैं तो बीजेपी ने भी एक समाजवादी नेता को अपने पाले में करके मायावती की राह मुश्किल करने की कोशिश की हैं। क्या पता चाल काम कर जाए जाये और 8 की जगह 9 सीटें मिल जाये। बस इतना सा ख़्वाब हैं बेचारे अमित शाह का जिसकी वजह से ये कदम उठाया हैं।
 
रही बात मर्यादा, उसूलों, आदर्शों की राजनीति की तो भईया उसकी अंत्येष्टि तो हम लोगों ने 2004 के चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी जी को हराकर कर ही दी थी जिसने उस समय ही ये साबित कर दिया था कि हमारे देश में मर्यादित राजनीति से सिर्फ दिल जीते जा सकते हैं चुनाव नही। तो सौ बात की एक बात ये कि अपने पास अब बस दो ही ऑप्शन हैं, या तो कभी भली कभी बुरी लगने वाली बीजेपी को वोट दें नहीं तो जनता को 2019 में कनेक्टेड MRI की सुविधा देने की शपथ राजमाता खा ही चुकी हैं।

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