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ज़रा सोचिये
एक समय ऐसा भी आया था जब विश्व और ब्रह्मांड सुंदरी बनना तो भारत की सुंदरियों के लिए बिल्कुल वैसा हो गया था जैसा एलियंस का दुनियां जीतने
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मजाक मजाक में
अब इसको आदत कह लें या जन्मजात स्वभाव, हम भारतीय बड़े ही स्वार्थ रहित जीव होते हैं जो अपना छोड़ हमेशा दूसरों के बारे में सोचते रहते हैं।
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ज़रा सोचिये
6 साल पहले मैंने मुंशी प्रेमचंद जी की लघुकथाओं का संग्रह ख़रीदा था। कथा संग्रह २ भागों में था पर पढने का कभी समय ही नही मिला। करीब 2.5 वर्ष पहले जब मेरी माँ
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इधर उधर की
फिल्मों का शौक शुरू से रहा हैं पर गोविंदा वाली पीढ़ी में जन्म लेने के कारण कभी भी मनमोहन देसाई के ज़माने की फिल्में देखना अच्छा नही लगा।
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ज़रा सोचिये
1992 में एक फ़िल्म आई थी, नाम था यलगार। फ़िल्म के एक सीन में 53 वर्षीय पुलिस इंस्पेक्टर फ़िरोज़ खान, जो फ़िल्म के प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, एडिटर और ज़ाहिर
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इधर उधर की
हमारे देश में राम राज्य की बातें बहुत होती हैं। राम राज्य होता तो सबके साथ बराबर का व्यवहार होता, शेर और बकरी एक घाट का पानी
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ज़रा सोचिये
कई बार मेरी माँ अपने एक ममेरे भाई को याद किया करती थी। वो कहती थी की वो बहुत अच्छा लड़का था पर छोटी सी उम्र मे ही
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ज़रा सोचिये
अब आप सोच रहे होंगे कि ये क्या बात हुई। चमक का ज़हर से क्या लेना देना। भई कलियुग हैं यहाँ कुछ भी हो सकता हैं। चमकीली चीज़
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इधर उधर की
आतंकवादी नाम सुनते ही एक ऐसे खूंखार इंसान की शक्ल ध्यान में आती हैं जिसका किसी दया धर्म से कोई लेना देना नही होता। जिसका मकसद सिर्फ और
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फिल्मों की चीरफाड़
अगर कोई मुझसे पूछे कि सिमरन फ़िल्म कैसी लगी तो मेरा उनसे सवाल होगा कि आपको “क्वीन” कैसी लगी थी। 2014 में न केवल खुद श्रेष्ठ फ़िल्म बनी
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